आचार्य चाणक्य के अनमोल विचार, Acharya Chanakya Niti Quotes in Hindi, Acharya Chanakya Niti Thoughts in hindi, Acharya Chanakya Niti Status in hindi

Motivational thoughts in hindi पर आज हम पढ़ेंगे महान विद्वान आचार्य चाणक्य के अनमोल विचार, Famous Acharya Chanakya Niti Quotes in Hindi, Acharya Chanakya Niti Thoughts in hindi, Acharya Chanakya Niti Status in hindi, Acharya Chanakya ke vichar.

आचार्य चाणक्य के अनमोल विचार Acharya Chanakya Niti Quotes in Hindi -:


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~ दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति नौजवानी और औरत की सुन्दरता है।

~ चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते।

~ लापरवाही अथवा आलस्य से भेद खुल जाता है।

~ वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है। वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है।

~ प्रयत्न ना करने से कार्य में विघ्न पड़ता है।

~ धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।

~ स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों को सम्मुख रखकर दोबारा उन पर विचार करें।

~ गरीब धन की इच्छा करता है, पशु बोलने योग्य होने की, आदमी स्वर्ग की इच्छा करते हैं और धार्मिक लोग मोक्ष की।

~ अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।

~ विचार ना करके कार्य करने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है।

~ सुख का आधार धर्म है। धर्म का आधार अर्थ अर्थात धन है। अर्थ का आधार राज्य है। राज्य का आधार अपनी इन्द्रियों पर विजय पाना है।

~ दुष्ट की मित्रता से शत्रु की मित्रता अच्छी होती है।


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~ कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।

~ दौलत, दोस्त ,पत्नी और राज्य दोबारा हासिल किये जा सकते हैं, लेकिन ये शरीर दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता।

~ विद्या ही निर्धन का धन है।

~ शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए।

~ एक राजा की ताकत उसकी शक्तिशाली भुजाओं में होती है। ब्राह्मण की ताकत उसके आध्यात्मिक ज्ञान में और एक औरत की ताक़त उसकी खूबसूरती, यौवन और मधुर वाणी में होती है।

~ भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।

~ अर्थ और धर्म, कर्म का आधार है।

~ शत्रु दण्ड नीति के ही योग्य है।

~ दुष्ट स्त्री बुद्धिमान व्यक्ति के शरीर को भी निर्बल बना देती है।

~ व्यक्ति अकेले पैदा होता है और अकेले मर जाता है। और वो अपने अच्छे और बुरे कर्मों का फल खुद ही भुगतता है और वह अकेले ही नरक या स्वर्ग जाता है।

~ पहले निश्चय करिए, फिर कार्य आरम्भ करिए।


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~ विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता।

~ सबसे बड़ा गुरु मंत्र अपने राज किसी को भी मत बताओ। ये तुम्हें खत्म कर देगा।

~ सांप के फन, मक्खी के मुख और बिच्छु के डंक में ज़हर होता है; पर दुष्ट व्यक्ति तो इससे भरा होता है।

~ सेवक को तब परखें जब वह काम ना कर रहा हो, रिश्तेदार को किसी कठिनाई  में, मित्र को संकट में, और पत्नी को घोर विपत्ति में।

~ मनुष्य की वाणी ही विष और अमृत की खान है।

~ आदमी अपने जन्म से नहीं अपने कर्मों से महान होता है।

~ व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता।


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~ अगर सांप जहरीला ना भी हो तो उसे खुद को जहरीला दिखाना चाहिए।

~ ईश्वर मूर्तियों में नहीं है। आपकी भावनाएँ ही आपका ईश्वर है। आत्मा आपका मंदिर है।

~ पुस्तकें एक मुर्ख आदमी के लिए वैसे ही हैं, जैसे एक अंधे के लिए आइना।

~ जिस प्रकार एक सूखे पेड़ को अगर आग लगा दी जाये तो वह पूरा जंगल जला देता है, उसी प्रकार एक पापी पुत्र पुरे परिवार को बर्वाद कर देता है।

~ हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ होता है। ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसमे स्वार्थ ना हो। यह कड़वा सच है।

~ जो अपने कर्म को नहीं पहचानता, वह अंधा है।

~ दंड का भय ना होने से लोग अकार्य करने लगते हैं।

~ प्रकृति का कोप सभी कोपों से बड़ा होता है।

~ जिसकी आत्मा संयमित होती है, वही आत्मविजयी होता है।

~ समय को समझने वाला कार्य सिद्ध करता है। समय का ज्ञान ना रखने वाले राजा का कर्म समय के द्वारा ही नष्ट हो जाता है।

~ कार्य की सिद्धि के लिए उदारता नहीं बरतनी चाहिए। दूध पीने के लिए गाय का बछड़ा अपनी माँ के थनों पर प्रहार करता है।


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~ संकट में बुद्धि भी काम नहीं आती है।

~ जो जिस कार्य में कुशल हो उसे उसी कार्य में लगना चाहिए।

~ किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब ना करें।

~ एक आदर्श पत्नी वो है जो अपने पति की सुबह माँ की तरह सेवा करे और दिन में एक बहन की तरह प्यार करे और रात में एक वेश्या की तरह खुश करे।

~ वो व्यक्ति जो दूसरों के गुप्त दोषों के बारे में बातें करते हैं, वे अपने आप को बांबी में आवारा घूमने वाले साँपों की तरह बर्बाद कर लेते हैं।

~ दुर्बल के साथ संधि ना करें।

~ किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है।

~ कच्चा पात्र कच्चे पात्र से टकराकर टूट जाता है।

~ शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है। एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है। शिक्षा सौंदर्य और यौवन को परास्त कर देती है।

~ आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।

~ जहाँ लक्ष्मी (धन) का निवास होता है, वहाँ सहज ही सुख-सम्पदा आ जुड़ती है।

~ सर्प, नृप, शेर, डंक मारने वाले ततैया, छोटे बच्चे, दूसरों के कुत्तों, और एक मूर्ख - इन सातों को नीद से नहीं उठाना चाहिए।

~ संधि और एकता होने पर भी सतर्क रहें।

~ शिकारपरस्त राजा धर्म और अर्थ दोनों को नष्ट कर लेता है।

~ भाग्य के विपरीत होने पर अच्छा कर्म भी दु:खदायी हो जाता है।

~ शत्रु की बुरी आदतों को सुनकर कानों को सुख मिलता है।

~ एक समझदार आदमी को सारस की तरह होश से काम लेना चाहिए। और स्थान, समय और अपनी योग्यता को समझते हुए अपने कार्य को सिद्ध करना चाहिए।

~ चोर और राजकर्मचारियों से धन की रक्षा करनी चाहिए।

~ सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।

~ ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।

~ शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।

~ आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।

~ ये मत सोचो की प्यार और लगाव एक ही चीज है। दोनों एक दूसरे के दुश्मन हैं। ये लगाव ही है जो प्यार को खत्म कर देता है।

~ अन्न के सिवाय कोई दूसरा धन नहीं है।

~ भूख के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं है।

~ अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।

~ सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।

~ किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी भी किसी भी शत्रु का साथ न करें।

~ एक संतुलित मन के बराबर कोई तपस्या नहीं है। संतोष के बराबर कोई खुशी नहीं है। लोभ के जैसी कोई बिमारी नहीं है। दया के जैसा कोई सदाचार नहीं है।

~ राजनीति का संबंध केवल अपने राज्य को समृद्धि प्रदान करने वाले मामलों से होता है।

~ सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।

~ जो गुजर गया उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए, ना ही भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए। समझदार लोग केवल वर्तमान में ही जीते हैं।

~ आलसी व्यक्ति का ना तो वर्तमान होता है और ना ही भविष्य।

~ प्रत्यक्ष और परोक्ष साधनों के अनुमान से कार्य की परीक्षा करें।

~ दोषहीन कार्यों का होना दुर्लभ होता है।

~ कठोर वाणी अग्नि दाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुँचाती है।

~ पृथ्वी सत्य पे टिकी हुई है। ये सत्य की ही ताक़त है, जिससे सूर्य चमकता है और हवा बहती है। वास्तव में सभी चीज़ें सत्य पे टिकी हुई हैं।

~ शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करें।

~ अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता ना करें। 

~ योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।

~ वेश्याएं निर्धनों के साथ नहीं रहतीं, नागरिक कमजोर संगठन का समर्थन नहीं करते, और पक्षी उस पेड़ पर घोंसला नहीं बनाते जिस पे फल ना हों।

~ एक अकेला पहिया नहीं चला करता।

~ अविनीत स्वामी के होने से तो स्वामी का ना होना अच्छा है।

~ स्वभाव का अतिक्रमण अत्यंत कठिन है।

~ दूध के लिए हथिनी पालने की जरुरत नहीं होती अर्थात आवश्कयता के अनुसार साधन जुटाने चाहिए।

~ वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है, अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते हैं।

~ फूलों की खुशबू हवा की दिशा में ही फैलती है, लेकिन एक व्यक्ति की अच्छाई चारों तरफ फैलती है।

~ जिस आदमी से हमें काम लेना है, उससे हमें वही बात करनी चाहिए जो उसे अच्छी लगे। जैसे एक शिकारी हिरन का शिकार करने से पहले मधुर आवाज़ में गाता है।

~ जैसे एक बछड़ा हजारों गायों के झुंड में अपनी माँ के पीछे चलता है। उसी प्रकार आदमी के अच्छे और बुरे कर्म उसके पीछे चलते हैं।

~ जो अपने कर्तव्यों से बचते हैं, वे अपने आश्रितों व परिजनों का भरण-पोषण नहीं कर पाते।

~ प्रकृति (सहज) रूप से प्रजा के संपन्न होने से नेता विहीन राज्य भी संचालित होता रहता है। 

~ ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता है, सम्पादन करता है।

~ इन्द्रियों पर विजय का आधार विनम्रता है।

~ निम्न अनुष्ठानों ( भूमि, धन-व्यापार, उधोग-धंधों ) से आय के साधन भी बढ़ते हैं।

~ शासक को स्वयं योग्य बनकर योग्य प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।

~ आलसी राजा अप्राप्त लाभ को प्राप्त नहीं करता। शक्तिशाली राजा लाभ को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।

~ सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।

~ सुख और दुःख में समान रूप से सहायक होना चाहिए।

~ ज्ञानी और छल-कपट से रहित शुद्ध मन वाले व्यक्ति को ही मंत्री बनाएँ।

~ समस्त कार्य पूर्व मंत्रणा से करने चाहिए।

~ विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त ना रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है।

~ आग में आग नहीं डालनी चाहिए। अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए।

~ भविष्य के अन्धकार में छिपे कार्य के लिए श्रेष्ठ मंत्रणा दीपक के समान प्रकाश देने वाली है।

~ अपमानित हो के जीने से अच्छा मरना है। मृत्यु तो बस एक क्षण का दुःख देती है, लेकिन अपमान हर दिन जीवन में दुःख लाता है।

~ कभी भी उनसे मित्रता मत कीजिये जो आपसे कम या ज्यादा प्रतिष्ठा के हों। ऐसी मित्रता कभी आपको ख़ुशी नहीं देगी।

~ मंत्रणा के समय कर्तव्य पालन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।

~ मंत्रणा रूप आँखों से शत्रु के छिद्रों अर्थात उसकी कमजोरियों को देखा-परखा जाता है।

~ ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते हैं।

~ राजा, गुप्तचर और मंत्री तीनों का एक मत होना किसी भी मंत्रणा की सफलता है।

~ कार्य – अकार्य के तत्व दर्शी ही मंत्री होने चाहिए।

~ छः कानों में पड़ने से ( तीसरे व्यक्ति को पता पड़ने से ) मंत्रणा का भेद खुल जाता है।

~ समय का ध्यान नहीं रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में निर्विघ्न नहीं रहता।

~ वो जो अपने परिवार से अति लगाव रखता है भय और दुख में जीता है। सभी दुखों का मुख्य कारण लगाव ही है, इसलिए खुश रहने के लिए लगाव का त्याग आवशयक है।

~ ईर्ष्या करने वाले दो समान व्यक्तियों में विरोध पैदा कर देना चाहिए।

~ जुए में लिप्त रहने वाले के कार्य पूरे नहीं होते हैं।

~ पूर्वाग्रह से ग्रसित दंड देना लोक निंदा का कारण बनता है।

~ धन का लालची श्रीविहीन हो जाता है।

~ दंड से सम्पदा का आयोजन होता है।

~ कार्य के मध्य में अति विलम्ब और आलस्य उचित नहीं है।

~ राज्यतंत्र को ही नीतिशास्त्र कहते हैं। राजतंत्र से संबंधित घरेलू और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।

~ कार्य-सिद्धि के लिए हस्त-कौशल का उपयोग करना चाहिए।

~ जिन्हें भाग्य पर विश्वास नहीं होता, उनके कार्य पूरे नहीं होते।

~ नीतिवान पुरुष कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही देश-काल की परीक्षा कर लेते हैं।

~ मूर्ख लोग कार्यों के मध्य कठिनाई उत्पन्न होने पर दोष ही निकाला करते हैं।

~ वो जिसका ज्ञान बस किताबों तक सीमित है और जिसका धन दूसरों के कब्ज़े मैं है, वो ज़रुरत पड़ने पर ना अपना ज्ञान प्रयोग कर सकता है ना धन।

~ एक अनपढ़ व्यक्ति का जीवन उसी तरह से बेकार है जैसे की कुत्ते की पूँछ, जो ना उसके पीछे का भाग ढकती  है ना ही उसे कीड़े-मकौडों के डंक से बचाती है।

~ दण्डनीति से आत्मरक्षा की जा सकती है। आत्मरक्षा से सबकी रक्षा होती है।

~ कार्य का स्वरुप निर्धारित हो जाने के बाद वह कार्य लक्ष्य बन जाता है।

~ अस्थिर मन वाले की सोच स्थिर नहीं रहती।

~ एक उत्कृष्ट बात जो शेर से सीखी जा सकती है वो ये है कि व्यक्ति जो कुछ भी करना चाहता है उसे पूरे दिल और ज़ोरदार प्रयास के साथ करे।

~ चतुरंगिणी सेना ( हाथी, घोड़े, रथ और पैदल ) होने पर भी इन्द्रियों के वश में रहने वाला राजा नष्ट हो जाता है।

~ जैसे एक सूखा पेड़ आग लगने पे पुरे जंगल को जला देता है। उसी प्रकार एक दुष्ट पुत्र पुरे परिवार को खत्म कर देता है।

~ संतुलित दिमाग जैसी कोई सादगी नहीं है, संतोष जैसा कोई सुख नहीं है, लोभ जैसी कोई बीमारी नहीं है, और दया जैसा कोई पुण्य नहीं है।

~ कोई काम शुरू करने से पहले, स्वयं से तीन प्रश्न कीजिये - मैं ये क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या हो सकते हैं और क्या मैं सफल होऊंगा। और जब गहराई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जायें, तभी आगे बढिए।


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